लोकसूचना पदाधिकारियों के लिए मार्गदर्शिका

सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 नागरिकों को किसी भी "लोक प्राधिकरण" से सूचना प्राप्त प्रदान करने का अधिकार प्रदान करता है। किसी लोक प्राधिकरण का केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी नागरिकों के सूचना  अधिकार का मूर्त रूप देने में मुख्या भूमिका निभाता है।  अधिनियम उसे विशिष्ट  सौंपता है और किसी त्रुटि के मामले में उसे शाषित होती जवाबदेह ठहराता है। अतः केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी  के लिए यह आवश्यक है कि वह अधिनियम का ध्यानपूर्वक अध्ययन करे और इसके प्रावधानों को भली भांति समझे।

लोकसूचना पदाधिकारियों के लिए मार्गदर्शिका

लोकसूचना पदाधिकारियों के लिए मार्गदर्शिका

कार्यालय ज्ञापन संख्या : 1/69/2007-आई.आर                                              दिनांक : 27/02/2008

सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 नागरिकों को किसी भी "लोक प्राधिकरण" से सूचना प्राप्त प्रदान करने का अधिकार प्रदान करता है। किसी लोक प्राधिकरण का केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी नागरिकों के सूचना  अधिकार का मूर्त रूप देने में मुख्या भूमिका निभाता है।  अधिनियम उसे विशिष्ट  सौंपता है और किसी त्रुटि के मामले में उसे शाषित होती जवाबदेह ठहराता है। अतः केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी  के लिए यह आवश्यक है कि वह अधिनियम का ध्यानपूर्वक अध्ययन करे और इसके प्रावधानों को भली भांति समझे। अधिनियम के अंतर्गत प्राप्त आवेदनों पर कार्यवाई करते समय उसे विशेष रूप से निम्न लिखित पहलुओं का ध्यान रखना चाहिए। 

सूचना क्या है ?

२. किस भी स्वरुप में कोई भी सामग्री "सूचना" इसमें किसी भी इलेक्ट्रॉनिक रूप में धारित अभिलेख, दस्तावेज, ज्ञापन, ईमेल, मत सलाह, प्रेस विज्ञप्ति, परिपत्र, आदेश, लॉग बुक, संविदा, रिपोर्ट, कागज पत्र, नमूने, मॉडल, आंकड़े सम्बन्धी सामग्री शामिल है।  इसमें किसी निजी निकाय से संबंधित ऐसी सूचना भी शामिल है।  जिसे लोक प्राधिकरण तत समय लागु किसी कानून के अंतर्गत प्राप्त कर सकता है। 

अधिनियम के अंतर्गत सूचना का अधिकार 

३. किसी नागरिक को किसी लोक प्राधिकरण से ऐसी सूचना मांगने का अधिकार है, जो उस लोक प्राधिकरण के पास उपलब्ध है या उसके नियंत्रण में उपलब्ध है।  इस अधिकार में लोक प्राधिकरण के पास या नियंत्रण में उपलब्ध कृति, दस्तावेजों या रिकॉर्डों का निरिक्षण, दस्तावेजों या रिकॉर्डों के नोट, उद्धरण या प्रमाणित प्रतियां प्राप्त करना, सामग्री के प्रमाणित  शामिल है। 

४. अधिनियम नागरिकों को संसद सदस्यों और राज्य विधानमंडल के सदस्यों के बराबर सूचना का अधिकार प्रदान करता है। अधिनियम के अनुसार ऐसी सूचना, जिसे संसद अथवा राज्य विधानमंडल को देने से इंकार नहीं किया जा सकता, उसे किसी व्यक्त को देने से इनकार नहीं किया जा सकता। 

५. नागरिकों को डिस्केट्स फ्लॉपी, टेप, वीडियो कैसेट या किसी अन्य इलेक्ट्रॉनिक रूप में अथवा प्रिंट आउट के रूप में प्राप्त करने  अधिकार है, बशर्तें की मांगी गई सूचना कंप्यूटर में या अन्य किसी युक्ति में पहले से सुरक्षित है जिससे उसे डिस्केट आदि में स्थानांतरित किया जा सकें। 

६. आवेदक को सूचना सामान्यतः उसी प्रकार में प्रदान की जानी चाहिए, जिसमें वह मांगता है। तथापि, यदि किसी विशेष स्वरुप में मांगी गई सूचना की आपूर्ति से लोक प्राधिकरण के संसाधनों को अनपेक्षित ढंग से विचलन होता  है या इससे रिकॉर्डों के परिरक्षण में कोई  संभावना होती है तो उस रूप में सूचना देने से मना किया जा सकता है। 

७. अधिनियम के अंतर्गत सूचना का अधिकार केवल भारत के नागरिकों को प्राप्त है। अधिनियम में निगम, संघ, कंपनी आदि को जो वैध हस्तियों या व्यक्तिओं की परिभाषा के अंतर्गत तो आते है किन्तु नागरिकों की  नहीं आते, को सूचना देने का कोई प्रधान नहीं है। फिर भी यदि किसी निगम, संघ, कंपनी, गैर सरकारी संगठन आदि के किसी ऐसे कर्मचारी या अधिकारी द्वारा प्रार्थना पत्र दिया जाता है जो भारत  का नागरिक है तो उसे सूचना दिया जाएगी, बशर्ते वह अपना नाम इंगित करें।  ऐसे मामले में यह प्रकल्पित होगा कि एक नागरिक द्वारा निगम आदि के पते पर सूचना मांगी गई है। 

८. अधिनियम के अंतर्गत केवल ऐसी सूचना प्रदान करना अपेक्षित है जो लोक प्राधिकारण के पास पहले से मौजूद है अथवा उसके नियंत्रण में है, केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी द्वारा सूचना सृजित करना; या सूचना की व्याख्या करना; या आवेदक द्वारा उठाई गई समस्याओं का समाधान करना या कल्पित प्रश्नों का उत्तर देना अपेक्षित नहीं है।

प्रकटीकरण से छुट प्राप्त सुचना

९. इस अधिनियम की धारा 8 की उप धारा (१) और धारा 9 में सूचना की ऎसी श्रेणियों का विवरण दिया गया है, जिन्हें प्रकटीकरण से छुट है . फिर भी धारा 8 की उपधारा (२) में यह प्रावधान है की उपधारा (1) के अंतर्गत छुट प्राप्त अथवा शासकीय गोपनीय अधिनियम, 1923 के अंतर्गत छुट प्राप्त सूचना का प्रकटीकरण किया जा सकता यदि प्रकटीकरण से संरक्षित हित को होने वाले नुकसान की अपेक्षा वृहतर लोकहित सधता हो . इसके अलावा धारा 8 की उपधारा (3) में यह प्रावधान है कि उपधारा (1) के खण्ड (क), (ग), (झ) में उपबंधित सुचना के सिवाए उस उपधारा के अंतर्गत प्रकटीकरण से प्राप्त सूचना, सम्बद्ध घटित होने की तारीख के 20 वर्ष बाद प्रकटीकरण से मुक्त नहीं रहेगी .

  1. स्मरणीय है कि अधिनियम की धारा 8 (3) के अनुसार लोक प्राधिकारियों से यह अपेक्षा नहीं की गई है कि वे अभिलेखों को अनंत काल तक सुरक्षित रखें . लोक प्राधिकरण को लोक प्राधिकरण में लागू अभिलेख धारण अनुसूची के अनुसार ही अभिलेखों को संरक्षित रखना चाहिए . किसी फाइल में रखी संरक्षित जानकारी फाइल/अभिलेख के नष्ट हो जाने के बाद भी कार्यालय ज्ञापन अथवा पत्र अथवा अन्य किसी भी रूप में मौजूद रह सकते है . अधिनियम के अनुसार यह अपेक्षित है कि धारा 8 की उपधारा (1) की के अंतर्गत प्रकटन से छुट प्राप्त होने के बावजूद भी 20 वर्ष के बाद इस प्रकार उपलब्ध जानकारी उपलब्ध करा दी जाये . अर्थ यह है कि ऐसी जानकारी जिसे सामान्य रूप से अधिनियम की धारा 8 की उपधारा (1) के अंतर्गत प्रकटन से छुट प्राप्त है, जानकारी से सम्बंधित घटना के घटित होने के 20 वर्ष बाद ऐसी छूटना से मुक्त हो जाएगी . तथापि निम्नलिखित प्रकार की जानकारी के लिए प्रकटन से छुट जारी रहेगी और 20 वर्ष बीत जाने के बाद भी ऐसी जानकारी को किसी नागरिक को देना बाध्यकारी नहीं होगा :-

      (i) ऐसी जानकारी जिसके प्रकटन से भारत की संप्रभुता और अखंडता, राष्ट्र की सुरक्षा, सामरिक, वैज्ञानिक और आर्थिक हित, विदेश के साथ सम्बन्ध प्रतिकूल रूप से प्रभावित होती हो अथवा को अपराध भड़कती हो;

      (ii) ऐसी जानकारी जिसके प्रकटीकरण से संसद अथवा राज्य के विधानमंडल के विशेषाधिकारों की अवहेलना होती हो; अथवा

      (iii) अधिनियम की धारा 8 उपधारा (1) के खण्ड (झ) के प्रावधान में दी गई शर्तों के अधीन मंत्रिपरिषद, सचिवों और अन्य अधिकारयों के विचार विमर्श सहित मंत्रिमंडल दस्तावेज .

सूचना का अधिकार बनाम अन्य अधिनयम

  1. सूचना का अधिकार अधिनियम का अन्य विधियों की तुलना में अधिभावी प्रभाव है . शासकीय गोपनीयता अधिनियम, 1923 और तत्काल प्रभावी किसी अन्य कानून में ऐसे प्रावधान, जो सूचना का अधिकार अधिनियम के प्रावधानों से असंगत है, की उपस्थिति की स्थिति में सूचना का अधिकार अधिनियम के प्रावधान प्रभावी होंगे .

आवेदकों को सहायता प्रदान करना

  1. केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारी का यह कर्तव्य है कि वह सूचना माँगने वाले व्यक्तियों को युक्तियुक्त सहायता प्रदान करें . अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार सूचना प्राप्त करने के इच्छुक व्यक्ति से अपेक्षित है कि वह अंग्रेजी अथवा हिंदी अथवा जस क्षेत्र में आवेदन किया जाना है, उस क्षेत्र की राजकीय भाषा में लिक्षित अथवा इलेक्ट्रिक माध्यम से अपना आवेदन प्रस्तुत करें . यदि कोई व्यक्ति लिखित रूप से निवेदन देने में असमर्थ है, तो केंद्रीय सूचना अधिकारी से अपेशा की जाती हा कि वह ऐसे व्यक्ति को लिखित रूप में आवेदन तैयार करने में युक्तियुक्त सहायता करें .
  2. यदि किसी दस्तावेज को संवेदनात्मक रूप से निःशक्त व्यक्ति को उपलब्ध कराना अपेक्षित है, तो केन्द्रीय लोकसूचना अधिकारी को ऐसे व्यक्ति को समुचित सहायता प्रदान करनी चाहिए, ताकि वह सूचना प्राप्त करने में सक्षम हो सके . यदि दस्तावेज की जाँच करनी हो, तो उस व्यक्ति के ऐसी जाँच के लिए उपयुक्त सहायता प्रदान की जानी चाहए .

केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारी को उपलब्ध सहायता

  1. केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारी किसी भी अन्य अधिकारी से ऐसी सहायता मांग सकता है, जिसे वह अपने कर्तव्य के समुचित निर्वहन के लिए आवश्यक समझता हो . अधिकारी, जिससे सहायता मांगी जात है, केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारी को सभी प्रकार की सहायता प्रदान करेगा . ऐसे अधिकारी को केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारी माना जाएगा और वह अधिनियम के प्रावधानों के उल्लंघन के लिए उसी प्रकार उतरदायी होगा, जिस प्रकार कोई अन्य केन्द्रीय लोक सूचना पदाधिकारी होता है . केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारी के लिए यह उचित होगा कि जब वह किसी अधिकारी से सहायता मांगे तो वह अधिकारी को उपर्युक्त प्रावधान से अवगत करा दें .